हम मजदुर है हमारी जीवन बहुत सस्ती है क्यूंकि हमारी कोई हस्ती नहीं है

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एक मई का दिन हर साल पूरी दुनिया में मज़दूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मज़दूर अपने हक़ के लिए सड़कों पर उतरकर आवाज़ बुलंद करते हैं, लेकिन इस बार उन्हें हक़ नहीं बल्कि ज़िंदगी बचाने और दो वक्त के रोटी पाकर पेट भरने की बड़ी समस्या से जूझना पड़ रहा है। केंद्र और प्रदेश की सरकार ने लॉक डाउन में फंसे मजदूरों को उनके घर वापस भेजे जाने की कवायद तो शुरू कर दी है, लेकिन जिलों का सरकारी अमला आज मजदूर दिवस के दिन भी उन्हें न सिर्फ भूखा रखे हुआ है, बल्कि उनके साथ डांट फटकार का रवैया अख्तियार करते हुए उनसे बदसलूकी भी कर रहा है।

देश के कोने कोने में हर मजदुर की एक ही कहानी उस कहानी में भूख नाम का खलनायक तो है लेकिन कोई हीरो दूर दूर तक उन्हें नहीं दिखाई पड़ता है।दिल्ली हो या गुजरात हर जगह सैकड़ो की तादात में मजदुर अपनी लड़ाई खुद लड़ रहें है।किसी प्रदेश का मुखिया हाँथ खरा कर यह भी कह देता है हम लाचार है हम अपने मजदुर भाई को नहीं बुला सकते हैं क्यों की मजदुर हमेसा से देश के सत्ता में बैठे लोगों के लिए कोई भी महत्व नहीं रखते हैं,बस 1 मई को मजदुर दिवस मना लेते है शायद मजदुर के लिए इस देश में इतना ही हक़ है.

भारत में ऐसे हुई मजदूर दिवस की शुरुआत
भारतीय मजदूर किसान पार्टी के नेता कामरेड सिंगरावेलू चेट्यार ने चेन्नई में 1 मई 1923 को इसकी शुरुआत की थी. भारत में मद्रास हाईकोर्ट के सामने मजदूर किसान पार्टी द्वारा बड़ा प्रदर्शन किया गया और एक संकल्प पास करके यह सहमति बनाई गई कि इस दिवस को भारत में भी मजदूर दिवस के तौर पर मनाया जाए और इस दिन छुट्टी का ऐलान किया जाए. उस समय भी भारत में मजदूरों की जंग लड़ने के लिए कई नेता सामने आए थे. जिनमें बड़ा नाम दत्तात्रेय नारायण सामंत उर्फ डॉक्टर साहेब और जॉर्ज फर्नांडिस का था.

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